प्रथम तंत्र – मित्रभेद

वर्द्धमानो महान्स्नेहः सिंहगोवृषयोर्वने ।
पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः ॥

वन में सिंह और बैल की प्रगाढ़ होती हुई मित्रता को एक दुष्ट गीदड़ अपनी कुटिलता से नष्ट कर देता है।

व्यक्ति को धूर्त लोगों की बातों में आ कर अपने मित्रों पर अविश्वास नहीं करना चाहिए, अन्यथा परिणाम निःसंदेह विनाशकारी होता है। इस बात के समर्थन में आचार्य विष्णु शर्मा ने राजकुमारों को यह कथा सुनाई।


भारत के दक्षिण में महिलारोप्य नामक नगर में वर्धमान नामक एक बनिया रहा करता था जो धनोपार्जन में निपुण था। एक रात सोते समय उसे विचार आया कि संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे धन से प्राप्त न किया जा सके। आजकल धन ही संसार में सर्वोत्तम साधन माना जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि बुद्धिमान् व्यक्ति को अधिकाधिक धन प्राप्त करना चाहिए।

इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते ।
स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ॥

धनी व्यक्तियों से पराये भी सम्बन्ध जोड़ते हैं, परंतु निर्धनों से अपने ही दूरी बना लेते हैं।

वर्धमान सोचते-सोचते इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि धन-प्राप्ति के छह साधन हैं

  1. भिक्षा
  2. नौकरी
  3. खेती-बाड़ी
  4. कोई शिल्पकला, अध्यापन अथवा ज्योतिष
  5. साहूकारी
  6. व्यापार

भिक्षावृत्ति को अपनाने वाले इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इससे पेट भरना भी सम्भव नहीं हो पाता।

नौकरी या सेवा का अर्थ है दूसरों के आदेशों का पालन करना और उनके अधीन रहना, जिससे एक निश्चित समय पर बंधा हुआ वेतन तो मिल जाता है, परंतु अधिक कमाने का कोई अवसर सुलभ नहीं होता।

खेती-बाड़ी में बहुत ही परिश्रम करना होता है और लाभ के लिए प्रकृति पर निर्भर होना पड़ता है।

शिल्प, अध्यापन अथवा ज्योतिष आदि किसी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए पहले किसी गुरु को प्रसन्न करना होता है।

साहूकारी में कई बार ब्याज तो ब्याज, मूलधन भी गंवाना पड़ जाता है।

इन पाँचों साधनों पर विचार करने के पश्चात् मैं व्यापार को ही धन-प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन मानता हूँ। व्यापार में असीम लाभ की आशा रहती है। यदि अधिक श्रम और धन का निवेश किया जाये तो लाभ भी अधिक होता है।

तच्च वाणिज्यं सप्तविधमर्थागमाय स्यात् ।
तद्यथा गान्धिकव्यवहारः, निक्षेपप्रवेशः, गोष्ठिककर्म, परिचितग्राहकागमः, मिथ्याक्रयकथनम्, कूटतुलामानम्, देशान्तराद्भाण्डानयनं चेति

सात प्रकार से व्यापार किया जा सकता है–
(१) जड़ी-बूटियों व सौंदर्य प्रसाधन – क्रीम, पाउडर, इत्र आदि का क्रय-विक्रय
(२) आभूषण आदि गिरवी रख कर ब्याज पर ऋण देना
(३) पालतू पशुओं का क्रय-विक्रय करना
(४) ग्राहकों का विश्वास जीतकर उन्हें बांधे रखना
(५) कम दाम में ख़रीदकर वस्तुओं को ऊँचे दाम पर बेचना
(६) नाप-तोल में हेराफेरी करना
(७) दूर देशों से बरतन आदि वस्तुओं को ला कर बेचना

जड़ी-बूटियों का व्यापार सर्वोत्तम तो होता है, क्योंकि इसमें एक का खरीद सौ का बेचा जाता है। परंतु इन पदार्थों का रख-रखाव जटिल होता है और हानि की संभावना अधिक होती है।

किसी की धरोहर घर में आ जाने पर ऋण देने वाला सेठ अपने कुल देवता से प्रार्थना करता है कि यदि धरोहर रखने वाले की मृत्यु हो जाये तो मैं आपकी अभिलषित वस्तु से पूजा करूँगा।

पशुधन रखने वाला व्यक्ति स्वयं को प्राणियों और प्रकृति का स्वामी समझ बैठता है।

बंधे ग्राहकों को आता देख उत्कंठित व्यापारी उनके धन पर आँख गड़ा इस प्रकार प्रसन्न होता है जैसे उसके यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ हो।

हेराफेरी, ठगी और परिचितों से प्रतिदिन असत्य कहना किरातों का स्वभाव है।

चतुर मनुष्य दूसरे देशों में जा कर उद्योग द्वारा दूना तिगुना धन प्राप्त कर लेते हैं।

ऐसा कह कर वर्धमान ने उत्तर भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्र मथुरा में बरतनों का व्यापार करने का निश्चय किया।

शुभ मुहूर्त अनुसार, बिक्री योग्य पात्रों को बैलगाड़ी में लाद कर, वर्धमान ने गुरुजनों की आज्ञा ली और मथुरा की ओर प्रस्थान किया। उसने अपनी गाड़ी में घर में उत्पन्न हुए सञ्जीवक तथा नन्दक नामक दो बैलों को जोता हुआ था। दोनों ही शुभलक्षणसंपन्न थे परंतु यमुना के तीर पर कीचड़ में फँस जाने से सञ्जीवक की टाँग टूट गई और दोनों बैल वहीं बैठ गये। उनकी यह दशा देख कर वर्धमान अत्यधिक दुःखी हुआ और आर्द्रहृदयता में तीन रात वहीं रुका रहा।

उसे इस प्रकार खिन्न देख साथियों ने कहा – “हे सेठजी! क्यों एक बैल के लिए सिंह और बाघ से युक्त तथा अनेक विपत्तियों वाले इस वन में हम सब साथियों को आपने संकट में डाल रखा है?” कहा भी गया है–

न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः ।
एतदेवात्र पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद् भूरिरक्षणम् ⁠॥१९॥

बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि थोड़े के लिए अधिक का नाश न करे। इसी में पाण्डित्य अर्थात् समझदारी है कि थोड़े से अधिक की रक्षा करें।

वर्धमान को यह बात उचित लगी और सञ्जीवक की देख रेख के लिये उसने दो रक्षक-पुरुषों को नियुक्त किया। फिर पास के गाँव से एक नया बैल ख़रीदकर गाड़ी में जोता और अपनी राह पर चल दिया। नियुक्त रक्षकगण भी उस वन को संकटयुक्त जान कर अगले दिन सञ्जीवक को वहीं छोड़ वर्धमान के पास पहुँचे और उसे बताया – “हे स्वामिन्! वह बैल तो मर गया और हम उसका अग्निसंस्कार कर आये हैं।”

इधर यमुना तट की स्वच्छ वायु से सञ्जीवक के प्राण जाग उठे। वहाँ मरकत मणि के समान छोटे तृण के अग्रभाग को खाता हुआ कुछ ही दिनों में शङ्कर जी के वृषभ समान मोटा ककुद् वाला और बलवान् हो गया। वह प्रतिदिन वल्मीकों के शिखर को अपने सींगों से विदीर्ण करते हुए गर्जन करता।

अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विनश्यति ॥२०॥

जिसका कोई रक्षक नहीं होता उसकी रक्षा भगवान् करते हैं, और जिसकी रक्षा सभी करते हैं दैव को स्वीकार न होने पर वह भी बच नहीं पाता। वन में परित्यक्त अनाथ भी जी जाता है, किंतु घर में विशेष प्रयत्न करने पर भी सुरक्षित प्राणी नष्ट हो जाता है।

एक दिन पिङ्गलक नाम का सिंह प्यास से व्याकुल हो यमुना किनारे जल पीने पहुँचा। उसने सहसा सञ्जीवक के अत्यन्त गम्भीर गर्जन को दूर से ही सुना और भयाक्रांत हो कर एक वटवृक्ष के पीछे छुप गया। उसके साथ उसके पूर्व मंत्री शृगाल के दो पुत्र करटक और दमनक भी थे। वह आपस में मंत्रणा करने लगे – “भद्र करटक! हमारा स्वामी तो जल पीने यमुना के तीर पर आया था, किंतु जलपान किए बिना ही यहाँ उदास क्यों बैठा है?” करटक बोला – “हे भद्र! हमें इस व्यर्थ के विषय में सोचने से क्या प्रयोजन?” कहा भी गया है–

अव्यापारेषु व्यापारं यो नरः कर्तुमिच्छति ।
स एव निधनं याति कीलोत्पाटीव वानरः ॥२१॥

दूसरों के काम में व्यर्थ हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जिस प्रकार कील को उखाड़ कर वह वानर नष्ट हो गया था।

करटक ने दमनक को उत्पाती वानर की कथा सुनायी

वानर की कथा सुना कर करटक बोला – “हम दोनों के खाने के लिए कुछ भोजन बचा हुआ रखा ही है, तो व्यर्थ में क्यों स्वामी के काम में टाँग अड़ायें?”
दमनक ने प्रत्युत्तर में कहा – “मित्र क्या तुम अपने जीवन का उद्देश्य केवल पेट भरना ही मानते हो? मैं तुम्हारे विचारों से सहमत नहीं हूँ। बुद्धिमान् लोगों मित्रों का उपकार और शत्रुओं का अपकार करने के लिए ही राजाश्रय की अभिलाषा करते हैं। यों तो कौन ऐसा है जो अपना पेट नहीं भर लेता?”

अप्रकटीकृतशक्तिः शक्तोऽपि जनस्तिरस्क्रियां लभते ।
निवसन्नन्तर्दारुणि लंघ्यो वह्निर्न तु ज्वलितः ॥३२॥

लकड़ी के अंदर रहने वाली आग का सभी उल्लंघन करते हैं, परंतु प्रज्वलित को कोई हाथ लगाने का भी साहस नहीं करता। उसी प्रकार अपनी शक्ति का प्रदर्शन ना करने वाला समर्थ व्यक्ति भी दूसरे का आदर ग्रहण नहीं कर पाता है।

दमनक के इस भाषण को सुनकर करटक बोला – “मित्र! तुम्हारा कहना उचित है, परंतु हम किस स्थिति में हैं क्या तुमने इस तथ्य पर भी विचार किया है? हम राजा के आधिकारिक सेवक नहीं हैं, केवल अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए उनके आगे-पीछे घूम रहे हैं। हम लोग यहाँ अप्रधान हैं।”

अपृष्टोऽत्राप्रधानो यो ब्रूते राज्ञः पुरः कुधीः ।
न केवलमसम्मानं लभते च विडम्बनम् ॥३३॥

जो गौण कुबुद्धि प्राणी बिना पूछे हुए राजा के सम्मुख बोलता है, वह केवल असम्मान को ही नहीं प्राप्त होता, बल्कि उपहास का पात्र भी बनता है।

वचस्तत्र प्रयोक्तव्यं यत्रोक्तं लभते फलम् ।
स्थायी भवति चात्यन्तं रागः शुक्लपटे यथा ॥३४॥

जैसे कि स्वच्छ श्वेत कपड़े पर ही रंग अच्छा चढ़ता है, वैसे ही बात वहाँ कहनी चाहिए जहां कहने से कुछ लाभ हो।

दमनक ने कहा – “मित्र में तुमसे असहमत हूँ। राजा की सेवा करने वाला साधारण व्यक्ति भी मुखिया बन सकता है।” शास्त्रों का वचन और जीवन का अनुभव है कि राजा, बेलें और स्त्रियाँ अपने पास रहने वाले को ही अपना लेती हैं, भले ही वह अशिक्षित और असंस्कृत ही क्यों न हो।

राजानमेव संश्रित्य विद्वान् याति परां गतिम् ।
विना मलयमन्यत्र चन्दनं न प्ररोहति ॥४२॥

राजा के आश्रय से ही विद्वान् व्यक्ति अपनी परम उन्नति को प्राप्त करता है, क्योंकि मलय पर्वत के अतिरिक्त चन्दन वृक्ष अन्यत्र नहीं उगता।

करटक ने पूछा – “तो अब तुम क्या करना चाहते हैं?”। दमनक ने समझाया – आज हम लोगों का स्वामी पिङ्गलक परिवार सहित भयभीत है। इसीलिए उसके समीप जाकर भय का कारण समझूँगा। फिर सन्धि (मेल), विग्रह (लड़ाई), यान (शत्रु पर चढ़ाई करना), आसन (सही समय की प्रतीक्षा करना), संश्रय (वर्तमान अथवा भावी प्रबल शत्रुओं के विरुद्ध शक्तिशाली राजा का आश्रयण करना) और द्वैधीभाव (दो शक्तिशाली शत्रु हों तो दोनों से मिलकर उनमें फूट डालना) – इन नीतियों में से किसी एक का आश्रय लूँगा।

करटक बोला – “मित्र! तुम यह कैसे कह सकते हो कि हमारा स्वामी किसी आशंका से ग्रस्त है?” दमनक ने फिर समझाया – इसे जानने में रखा ही क्या है? क्योंकि कहा भी तो है–

उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति चोदिताः ।
⁠अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥४४॥

कही हुई बात का अर्थ तो पशु भी ग्रहण कर लेते हैं, हाथी और घोड़े भी स्वामी के संकेत को समझ कर भार वहन करते हैं। किन्तु पण्डित वही है जो बिना कही हुई बात को भी समझ ले, क्योंकि उनकी बुद्धि दूसरों के भाव को जानने वाली होती है।

“यदि मैं भयग्रस्त स्वामी के भय का कारण जान कर उन्हें भयमुक्त कर सका, तो मुझे पूरा विश्वास है कि वह मुझे मंत्री की पदवी सौंप देंगे” – दमनक के यह कहने पर करटक को विश्वास हो गया कि वह राजनीति में निपुण है। उसने आगे पूछा – “तुम राजा से किस प्रकार संपर्क साधोगे, मुझे बताओ?” दमनक ने उत्तर में कहा–

उत्तरादुत्तरं वाक्यं वदतां सम्प्रजायते । सुवृष्टिगुणसम्पन्नाद्‌बीजाद्‌बीजमिवापरम् ॥६४॥

जिस प्रकार धरती में पड़ा बीज वर्षा हो जाने पर फलने लगता है, उसी प्रकार मिलने पर बातचीत भी होने लगती है।

करटक बोला – “बन्धु! मैं मानता हूँ कि राजा लोग कठोर हृदय होते हैं और सदैव दुष्टों से घिरे रहते हैं। उनका कृपा पात्र बनना सरल नहीं होता। जिस प्रकार सांप की दो जीभें होती हैं, वे दूसरों को डसने का ही काम करते हैं, सदा बिल की खोज करते रहते हैं और दूर रखे जाते हैं, उसी प्रकार राजा भी दो जीभों वाले होते हैं। उनके कथन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। वे दूसरों को दण्डित करने के आदी होते हैं, अतः उनसे भी सांपों की तरह दूर रहना ही उचित होता है। यदि तुम स्वामी के पास जाना चाहते हो तो जाओ, मैं तुम्हारी सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करूँगा। परंतु जाने से पहले राजा को वश में करने के यह नियम सुनते जाओ”–

सरुषि नृपे स्तुतिवचनं तदभिमते प्रेम तदि्द्वषि द्वेषः ।
तद्दानस्य च शंसा अमन्त्रतन्त्रं वशीकरणम् ॥७६॥

1. राजा का कोपभाजन बने व्यक्ति से कोई भी सम्बन्ध न रखना तथा उसे अपने पास भी न फटकने देना।
2. राजा के सम्मुख अथवा उसकी पीठ पीछे भी सदैव उसकी प्रशंसा करना तथा उसके क्रुद्ध होने पर भी उसका स्तुतिगान ही करना।
3. सदा ही राजा को प्रिय लगने वाले विषय की प्रशंसा करना और उसे अप्रिय लगने वाले विषय की निन्दा करना।
4. राजा की उदारता एवं उसकी दानशीलता का इस प्रकार गुणगान करना कि राजा को हर ओर से वही सुनाई दे।

दमनक अपने मित्र करटक का अभिवादन कर पिङ्गलक की ओर चल दिया। उसे आता देख पिङ्गलक ने द्वारपालों को कहा – “दमनक हमारे पूर्व मन्त्री का पुत्र है, इसे आने दिया जाए”। दमनक ने पिङ्गलक को प्रणाम किया और निर्दिष्ट आसान पर चुपचाप जा बैठा। पिङ्गलक ने कहा – “कहिए सब कुशल मंगल तो है, आप बहुत दिनों बाद कैसे दिखाई पड़े?” दमनक ने विनीत स्वर में उत्तर दिया – “प्रणाम महाराज! हम तो वंश परम्परा से आपके शुभचिन्तक एवं सुख-दुःख के साथी रहे हैं। परंतु आपने बहुत दिनों बाद दिखने की उलाहना दी है तो इसका कारण भी जान लीजिए। जहां गुणी और गुणरहित सेवकों में अन्तर नहीं किया जाता, ऐसी जगह कोई स्वाभिमानी सेवक कब तक टिक सकता है? काँच को मणि और मणि को काँच बताने वाले बुद्धिहीन स्वामी के पास गुणी सेवक कब तक टिक सकता है? स्वामी! मुझे साधारण शृगाल समझ कर आपको मेरी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी”।

कौशेयं कृमिजं सुवर्ण-मुपलाद् दूर्वापि गोरोमतः
पङ्कात्तामरसं शशाङ्क उदधेरिन्दीवरं गोमयात् ।
काष्ठादग्निरहेः फणादपि मणिर्गोपित्ततो रोचना
प्राकाश्यं स्वगुणोदयेन गुणिनो गच्छन्ति किं जन्मना ॥१०३॥

कीड़ों से रेशम, पाषाण से स्वर्ण, गोरोम से दूर्वा, कीचड़ से लाल कमल, गोबर से नील कमल, समुद्र से चन्द्रमा, गोपित्त से गोरोचन उत्पन्न होता है। इन सभी के उत्पत्ति स्थान तुच्छ होने पर भी, अपने गुणों के कारण ही उनकी प्रतिष्ठा है। गुणी लोग अपने गुणों के उदय होने के कारण ही प्रकाशित होते हैं, न कि केवल जन्म लेने से।

दमनक पिङ्गलक से एकान्त में चर्चा करना चाहता था। उसने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कोई भी बात दो व्यक्तियों के बीच होने पर ही गुप्त रहती है, तीसरे व्यक्ति के कानों में पड़ते ही उसकी गोपनीयता नष्ट हो जाती है। अतः बुद्धिमान् व्यक्ति को अपना रहस्य दो व्यक्तियों तक ही सीमित रखना चाहिए। यह सुन कर सभा में बैठे व्याघ्र, गेंडा, बगुला आदि सब उठकर चल दिये। एकान्त होने पर दमनक ने पिङ्गलक से पूछा – “महाराज! आप तो यहाँ अपनी प्यास बुझाने आये थे, फिर बिना जल पिये यहाँ क्यों डेरा डाले बैठे हैं?”

सुहृदि निरन्तरचित्ते गुणवति भृत्येऽनुवर्तिनि कलत्रे ।
स्वामिनि सौहृदयुक्ते निवेद्य दुःखं सुखी भवति ॥११०॥

विश्वस्त मित्र से, निष्ठावान् सेवक से, आज्ञाकारिणी पत्नी से तथा शुभचिन्तक स्वामी से अपना दुःख-सुख कहने में संकोच नहीं करना चाहिए; क्योंकि यही लोग—मित्र, सेवक, पत्नी और स्वामी—कुछ समाधान कर सकते हैं।

दमनक के वचनों पर विचार के पश्चात् पिङ्गलक को लगा कि वह समझदार है, अतः मुझे इसे सब स्पष्ट कर देना चाहिए। उसने दबे स्वर में कहा – “दूर से आती हुई यह गर्जना सुन रहे हो दमनक? मुझे लगता है यहाँ कोई नया जीव आ गया है और यह हृदयविदारक गर्जना उसी की जान पड़ती है। मुझे तो लगता है वह अत्यन्त बलशाली भी होगा। मैं इस जंगल को छोड़कर किसी दूसरे जंगल में जाने का विचार कर रहा हूँ”। दमनक ने ढाढ़स बँधाया – “एक गर्जन के भय से यह वन छोड़ देना अनुचित होगा। यह आवश्यक तो नहीं की गर्जन किसी जीवित प्राणी का हो। बांस, वीणा, ढोल, नगाड़े और दो वृक्षों की टकराहट की भी ध्वनि हो सकती है। धैर्य धारण करें, केवल शब्दमात्र से भयभीत होना आपको शोभा नहीं देता।”

पिङ्गलक को दमनक ने गोभायु की कथा सुनायी

कथा सुनकर पिङ्गलक ने कहा – “मेरा पूरा परिवार यहाँ से भागने का निश्चय कर चुका है, फिर मैं अकेला क्या कर सकता हूँ?” इस पर दमनक ने कहा – “महामहिम! आप अपने परिजनों को दोष न दीजिए, वह आपको भयभीत देख कर घबरा गये हैं।”

अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च ।
पुरुषविशेषं प्राप्ता भवन्त्ययोग्याश्च योग्याश्च ॥११९॥

घोड़ा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, नर और नारी—ये सब जिस प्रकार के पुरुष के साथ रहते हैं, उसी के अनुसार अपने आप को ढाल लेते हैं।

दमनक ने कहा – “स्वामी का कार्य करते समय सेवक को सुरक्षा-असुरक्षा का विचार नहीं करना चाहिए। अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं इस भयंकर शब्द की जानकारी ले कर आता हूँ। तब तक आप यहाँ प्रतीक्षा करें। उसके बाद आप जो उचित समझें, वह निर्णय लें।” इस पर पिङ्गलक बोला – “ठीक है, तुम जाओ, ईश्वर तुम्हारी सहायता करे।” सिंह को प्रणाम निवेदन कर दमनक ध्वनि के स्रोत की ओर चल दिया।

दमनक के चले जाने पर भय से व्याकुलचित्त हो कर पिङ्गलक ने विचार किया – “कहीं दमनक को अपना रहस्य बता कर मैंने गलती तो नहीं कर दी? कहीं यह मुझसे अपने पदच्युत होने का बदला तो नहीं लेगा। जो राजा से पहले सम्मान पा कर फिर अपमानित होते हैं, वे उसके नाश के लिए सर्वदा कार्यरत रहते हैं, भले ही वह कुलीन क्यों न हों। दमनक मुझे मारने के लिए कहीं उस भयंकर प्राणी को अपने साथ यहाँ न ले आये?” ऐसा सोच कर पिङ्गलक एक सुरक्षित स्थान पर छिप गया और दमनक की राह देखने लगा।

उधर दमनक ने सञ्जीवक को ढूँढ लिया और प्रसन्नचित्त हो कर सोचा – अरे, हमारे स्वामी के दर का कारण तो यह बैल है। बड़ा अच्छा हुआ। इसके साथ स्वामी की मित्रता अथवा युद्ध हो जाता है तो उनको अपने वश में करना कितना आसान हो जाएगा?

सदैवापद्गतो राजा भोग्यो भवति मन्त्रिणाम् ।
अत एव हि वाञ्छन्ति मन्त्रिणः सापदं नृपम् ॥१२८॥

संकट के समय राजा को अपने अनुकूल बनाना मन्त्री के लिए बड़ा सरल होता है। इसीलिए समझदार मन्त्री राजा के सिर पर सदा ही किसी ना किसी विपत्ति की तलवार लटकाए रखता है।

यह सोच कर दमनक पिङ्गलक के पास पहुँचा और सञ्जीवक का वर्णन करके बोला – “महाराज! क्षमा करें पर उसके सामने हम दुर्बल भी सिद्ध हो सकते हैं। अब यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं उसे आपका सेवक बना सकता हूँ। बुद्धिमत्तापूर्वक कार्य करने से सब कुछ सम्भव हो सकता है।” पिङ्गलक ने कहा – “यदि तुम ऐसा कर सको, तो मैं तुम्हें पुनः मन्त्रीपद सौंप दूँगा। तुम्हें मेरी प्रजा और मेरे कर्मचारियों पर कृपा करने और दण्ड देने का अधिकार भी होगा।”

पिङ्गलक से आश्वासन पा कर दमनक तुरंत सञ्जीवक के पास पहुँचा और उसे धमकाया – “अरे दुष्ट बैल! तू किसलिए इस प्रकार गर्जन-तर्जन करके वन की शान्ति को भंग कर रहा है? क्या तुझे पता नहीं कि महाराज पिङ्गलक इस जंगल के स्वामी हैं? क्या तूने उनसे इस वन में घूमने-फिरने की अनुमति ली है? चल, उन्होंने तुझे बुलाया है।” दमनक की धौंस सुन कर सञ्जीवक घबरा गया और पूछा – “यह पिङ्गलक कौन है?” दमनक ने उत्तर दिया – “क्या तू हमारे स्वामी से अपरिचित है? लगता है तू उनका शिकार बनना चाहता है, जो इस प्रकार की बातें कर रहा है? वहाँ वटवृक्ष के नीचे हमारे स्वामी अपने सचिवों और अधिकारियों के साथ बैठे हुए हैं। चल!” मृत्यु को अपने सिर पर मण्डराता देख सञ्जीवक गिड़गिड़ाया – “भाई, तुम मुझे दयालु होने के साथ ही व्यवहार-कुशल भी लगते हो। क्या तुम अपने स्वामी से मेरी रक्षा करने की कृपा नहीं करोगे?” दमनक ने स्वीकृत भाव से कहा – “भाई! मैं तुम्हारी स्थिति को जान रहा हूँ और स्वामी से तुम्हारी रक्षा करने का प्रयत्न भी करूँगा, किन्तु पूर्ण रूप से विश्वास नहीं दिला सकता। तुम यहाँ प्रतीक्षा करो, मैं राजन् के मन की स्थिति देखकर आता हूँ।”

सञ्जीवक को दिलासा दे कर दमनक ने पिङ्गलक के पास जाकर कहा – “स्वामिन् वह कोई साधारण जानवर नहीं है। वह तो भगवान् महेश्वर का वाहनस्वरूप वृषभ है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि शंकर जी ने प्रसन्न हो कर यमुना के तीरवर्ती प्रदेश में बाल तृण खाने के लिए मुझे आज्ञा दी है। और कहने से क्या प्रयोजन? भगवान् ने उसे क्रीड़ा हेतु यह वन भी दिया है।” पिङ्गलक ने काँपते हुए कहा – “ठीक-ठीक अब मैंने समझ लिया, देवता की अनुकम्पा के बिना, सर्पों से भरे इस घोर जंगल में एक घास खाने वाला जीव निःशंक हो, गर्जन करता हुआ, कैसे घूम सकता है? तो फिर उससे तुमने क्या कहा?” दमनक ने बोला – “मैंने यह कहा कि यह वन भगवती चण्डिका के वाहनस्वरूप मेरे स्वामी पिङ्गलक नामक सिंह का अधिकार क्षेत्र है। इसलिए आप हमारे अभ्यागत हुए। यदि आप अतिथि बन कर यहाँ रहना चाहते हैं, तो उनके पास चलकर उनसे मित्रता कर लीजिए और फिर आनन्दपूर्वक मौज कीजिए। इस पर उस बैल ने आपसे परिचय करवाने के लिए मुझसे प्रार्थना की।” दमनक की प्रशंसा करते हुए पिङ्गलक बोला – “धन्य बुद्धिमान्! धन्य मन्त्रिश्रेष्ठ! मानो मेरे हृदय से ही सम्मति लेकर तुमने ऐसा कहा! इसीलिए मैंने उसे अभय दक्षिणा प्रदान की। किन्तु अब उससे भी मुझे अभय दान दिलाकर उसे शीघ्रातिशीघ्र लाओ।”

पिङ्गलक को प्रणाम कर दमनक सञ्जीवक के पास पहुँचा – “स्वामी ने तुम्हें यहाँ पर रहने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी है। तुम चाहो, तो उनसे भेंट करने के लिए चल सकते हो। पर यह ना भूलना की यह मित्रता मेरे कारण ही सम्भव हो पायी है और मेरे इस उपकार को भुला मत देना। इस कार्य के फलस्वरूप मुझे मन्त्रीपद दिया जाएगा और राज्य का सारा कार्यभार मेरे कंधों पर ही होगा। अगर हमारी मित्रता बनी रहेगी, तो हम दोनों ही मौज करेंगे।

यो न पूजयते गर्वादुत्तमाधममध्यमान् ।
भूपसम्मानमान्योऽपि भ्रश्यते दन्तिलो यथा ॥१४१॥

गर्वोन्मत्त होकर उत्तम, मध्यम तथा अधम राज्याधिकारियों की उपेक्षा करने वाला व्यक्ति राजा का कृपापात्र होने पर भी दन्तिल की भांति अपने पद को खो देता है।

दमनक ने सञ्जीवक को दन्तिल की कथा सुनायी

कथा सुन कर सञ्जीवक ने दमनक को मित्रता का आश्वासन दिया और दोनों पिङ्गलक की ओर चल दिये। वटवृक्ष पहुँच दोनों ने पिङ्गलक को सादर प्रणाम किया और एक और बैठ गये। पिङ्गलक ने आशीर्वाद देने हेतु सञ्जीवक के कंधे पर अपना हाथ रखा और पूछा – “इस सूने जंगल में आप कहां से और कैसे आये हैं?” सञ्जीवक ने अपना वृत्तान्त कहा और जिस प्रकार वर्धमान से वियोग हुआ वह सब बातें भी कह दीं। उसे सुनकर पिङ्गलक ने अत्यधिक आदर के साथ कहा – “हे मित्र! तुम मत डरो! मेरे भुजपञ्जर से सुरक्षित होकर अब स्वछन्दतया विचरण करो, और नित्य मेरे समीप रहा करो। क्योंकि बहुत आपत्तिपूर्ण भयंकर जानवरों से सेवित्त इस वन में बड़े-बड़े जीव नहीं टिक पाये, फिर एक घास खाने वाले पशु की बात ही क्या है।” सञ्जीवक को इस प्रकार दिलासा दे कर पिङ्गलक ने समस्त मृगों के साथ यमुना तट पर जा कर जलपान किया और फिर अपने निवास की और चल दिया।

उसी दिन से दमनक को राज्य-भार सौंपकर पिङ्गलक अपने मित्र सञ्जीवक के साथ सुभाषित गोष्ठी का सुख अनुभव करता हुआ रहने लगा। सञ्जीवक अनेक शास्त्रों का ज्ञाता और विवेकशील था। उसने थोड़े ही दिनों में उस मूर्खबुद्धि पिङ्गलक को ऐसा बुद्धिमान् बना दिया कि वन धर्म (स्वाभाविक हिंसा) से पृथक् हो वह ग्राम्य धर्म (ग्रामवासियों के स्वाभाविक दया धर्म) में लग गया। प्रतिदिन पिङ्गलक और सञ्जीवक एकान्त में मन्त्रणा करते और अवशिष्ट सब मृगगण दूर रहते थे। करटक और दमनक को भी प्रवेश की अनुमति नहीं थी। इसके अतिरिक्त सिंह के शिकार न करने के कारण, सब मृग और वे दोनों शृगाल भी भूखे एक किनारे बैठे रहते थे।

स्वामी की कृपा से रहित तथा भूख से पीड़ित करटक और दमनक आपस में सलाह करने लगे। दमनक ने कहा – “आर्य करटक! हम दोनों फिर गौण हो गये। यह पिङ्गलक सञ्जीवक के प्रति अनुरक्त हो कर अपने कार्य (जीवहिंसा) से विमुख हो गया है। हमारे सब परिजन भी यहाँ से चले गये हैं। अब क्या किया जाय।” करटक बोला – “मित्र! स्वामी तुम्हारी बात तो सुनता नहीं है, फिर भी मेरे विचार में उसे सुमार्ग पर लाने के लिए तुम्हें प्रयत्न करना चाहिए। तुमने इस घास खाने वाले बैल की राजा से मित्रता करा कर स्वयं ही अपने पैर में कुल्हाड़ी मारी है।” दमनक ने दुःखी हो कर कहा – “यह सत्य है, इसमें मेरा ही दोष है, न कि स्वामी का।” कहा भी है –

जम्बूको हुडुद्धेन वयं चाषाढभूतिना ।
दूतिका परकार्य्येण त्रयो दोषाः स्वयंकृताः ॥१७६॥

जिस प्रकार यें तीनों—भेड़ों के झुण्ड में आ जाने से गीदड़, आषाढ़भूति के झांसे में आ जाने से देवदत्त और अन्य स्त्री के स्थान पर बंध जाने से दूती—अपने ही दोष के कारण संकट में पड़ गये थे, उसी प्रकार मैं भी अपने विनाश के लिए स्वयं ही उत्तरदायी हूं।

दमनक ने करटक को इन तीनों की कथा सुनायी

कथा सुनकर करटक ने पूछा – “बंधु! अब तुम क्या करना चाहते हो?” दमनक ने उत्तर दिया – “अब मैं सञ्जीवक और पिङ्गलक के मध्य फूट डालकर दोनों को पृथक् कर दूँगा। शास्त्रकारों ने भी कहा है –”

एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता ।
बुद्धिर्बुद्धिमतः सृष्टा हन्ति राष्ट्रं सनायकम् ॥२१५॥

धनुर्धारी के धनुष से छूटा हुआ बाण चाहे किसी को मारे या न मारे, किंतु नीतिज्ञ बुद्धिमानों की बुद्धि से किया हुआ कार्य राजा सहित समस्त राज्य को नष्ट कर देता है।

“अतः मैं माया-प्रपञ्च द्वारा, गुप्तरूप से षड्यन्त्र रचकर फूट डाल दूँगा।” करटक ने कहा – “भद्र! यदि किसी प्रकार तुम्हारे कपटाचरण को उन्होंने जान लिया तो अवश्य ही व्याघात होगा।” दमनक बोला – “बंधु! तुम चिन्ता ना करो। बुद्धिमान् व्यक्ति को स्वयं को भाग्य के भरोसे न छोड़कर अपनी स्थिति में सुधार करने के लिए प्रयत्नरत होना चाहिए। उद्योग में तत्पर मनुष्य को कभी कभी बुद्धि द्वारा साम्राज्य तक प्राप्त हो जाता है।”

उद्योगिनं सततमत्र समेति लक्ष्मीर्दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिद्ध‍यति कोऽत्र दोषः ॥२१७॥

उद्योग में तत्पर मनुष्य को इस लोक में सदा लक्ष्मी प्राप्त होती रहती है। ‘भाग्य-भाग्य’ का रोना कायर पुरुष रोते हैं। भाग्य को ठुकरा कर अपनी शक्ति भर पुरुषार्थ करो। प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध ना हो तो इसमें कौन सी त्रुटि रह गई इसका अनुसन्धान करना चाहिए।

दमनक ने आगे कहा – “मैं अपनी योजना इस प्रकार काम में लाऊँगा की दोनों को इसकी भनक तक नहीं पड़ेगी। भली भाँति छिपाकर किए पाखण्ड के अन्त को तो ब्रह्मा भी नहीं जान सकते। जैसे विष्णु का रूप धरे एक जुलाहे के द्वारा राजपुत्री के साथ कामोपभोग का पता किसी को भी नहीं चला था।”

दमनक ने करटक को विष्णु बने जुलाहे की कथा सुनायी

कथा सुनाकर दमनक ने कहा – “अनेक बार उचित प्रकार से प्रयोग किए गये दम्भ के द्वारा भी अभीष्ट सिद्धि की जा सकती है।” करटक अब भी सशंकित था। उसने बोला – “बन्धु! मुझे तो भय ही लगता है। सञ्जीवक बुद्धिमान् है, और पिङ्गलक उग्र और क्रोधी है। मैं तुम्हारी वाकपटुता से प्रभावित हूँ, परन्तु उन दोनों को पृथक् करने में तुम्हें अभी भी असमर्थ मानता हूँ।” दमनक ने उत्तर दिया – “मैं सीमित साधनों के होते हुए भी अपना उद्देश्य सिद्ध करने में अवश्य सफल होऊँगा। मैं जानता हूँ कि पराक्रम द्वारा जो भी कार्य न किया जा सके, बुद्धि के समुचित उपाय से वह भी सम्भव हो जाता है।”

दमनक ने करटक को कौए और अजगर की कथा सुनायी

कथा सुनाकर दमनक ने कहा – “बुद्धिमान् प्राणी ही शारीरिक बल का उचित प्रयोग कर सकता है। बुद्धिहीन व्यक्ति के लिए तो बल का होना-न होना एक समान है। एक छोटे-से खरगोश ने बुद्धि बल से एक मतवाले सिंह को मार कर यह सिद्ध किया था कि बुद्धि के सामने शक्ति महत्त्व कुछ भी नहीं होता।”

दमनक ने करटक को खरगोश और सिंह की कथा सुनायी

कथा सुनाकर दमनक ने कहा – “मैं बुद्धि को ही असली शक्ति मानता हूँ। यदि तुम मुझसे सहमत हो, तो मैं पिङ्गलक और सञ्जीवक में अपनी बुद्धि के प्रभाव से फूट डाल दूँ।” करटक बोला – “मित्र! ऐसी बात है तो जाओ, तुम्हारा मार्ग मंगलकारी हो। तुम अपना अभिलषित कार्य पूर्ण करो।” यह सुनकर दमनक चल पड़ा।

उसने पिङ्गलक को अकेला देख प्रणाम किया और चुपचाप बैठ गया। जब पिङ्गलक ने आने का कारण पूछा तो दमनक ने उत्तर दिया – “श्रीमान् के चरणों को मुझसे कुछ प्रयोजन नहीं था, इसीलिए मैं नहीं आता था, किन्तु राजकार्य का नाश देखकर व्यथित हो कर व्यग्रता के कारण स्वयं ही कहने के लिए आया हूँ।” दमनक की पीड़ा को समझते हुए पिङ्गलक ने कहा – “तुम्हें जो कुछ कहना हो, निर्भय हो कर कहो।” दमनक बोला – “महाराज! सञ्जीवक आपके प्रति द्रोहबुद्धि रखता है। उसने मुझ विश्वासपात्र के प्रति एकान्त में ऐसी बात कही है कि – ‘हे दमनक! मैंने इस राजा का बलाबल देख लिया, अतः मैं इसे मार कर समस्त प्राणियों का आधिपत्य ग्रहण करूँगा और तुम्हें मन्त्री पद से अलंकृत करूँगा।’” दमनक के मुख से यह सुनकर पिङ्गलक की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। दमनक भी उसकी मुखाकृति देखकर विचार करने लगा कि यह तो सञ्जीवक के प्रेम में बद्ध है, अतः यह राजा अवश्य ही विनाश को प्राप्त होगा।

दमनक इस विषय पर सोच ही रहा था कि पिङ्गलक कहने लगा – “सञ्जीवक तो मेरा प्रिय सेवक है। वह मेरे साथ विश्वासघात नहीं कर सकता।” दमनक ने कहा – “महाराज! सेवक सर्वदा सेवक ही रहे, यह निश्चित नहीं है। फिर स्वामी किस विशेष गुण के कारण गुणहीन सञ्जीवक को अपने निकट रखे हुए हैं? यदि आप सोचते हैं कि यह महाकाय और बलवान् है, इसके द्वारा मैं शत्रुओं को पराजित करूँगा तो वह भी इससे सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि यह घास खाने वाला है और आपके शत्रु मांसाहारी हैं, अतः इसकी सहायता से शत्रु से प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता। इसलिए इस पर राजद्रोह का दोष लगाकर आप मार डालिए।”

पिङ्गलक ने पूछा – “मैंने तुम्हारे कहने से ही इसको अभय दान दिया है। फिर स्वयं कैसे इसे मार सकता हूँ। यह सञ्जीवक सब तरह से हमारा मित्र है। अतः उसके प्रति हमें थोड़ा भी क्रोध नहीं है। जो उपकार करने वालों के प्रति उपकार करता है उसके उपकारीपन में कौन सा गुण हुआ? जो अपकार करने वालों के प्रति सरल व्यवहार करता है वही यथार्थतः सज्जनों द्वारा साधु कहा गया है। अतः इसके द्रोहबुद्धि रखने पर भी मैं इसके विरुद्ध आचरण नहीं कर सकता।” दमनक ने कहा – “स्वामिन्! यह राजधर्म नहीं है कि द्रोह रखनेवाले को भी क्षमा कर दिया जाय। जबसे आपने इस बैल से मित्रता की है आप राजनीति को भी भूल गए हैं। यह घास-फूस खाने वाला है, जबकि आप मांसाहारी हैं। आपके सभी आश्रित भी मांसाहारी हैं। जब आप हमारे लिए उद्यम नहीं करेंगे, तो हम कहाँ से खाएँगे और कैसे जीवित रहेंगे? सबका आपको छोड़कर चले जाने का कारण भी यही है। सञ्जीवक के साथ रहने से आपकी शिकार करने की प्रवृत्ति ही नहीं होगी और इस प्रकार राजधर्म का पालन भी नहीं हो सकेगा।”

न ह्यविज्ञातशीलस्य प्रदातव्यः प्रतिश्रयः ।
मत्कुणस्य च दोषेण हता मन्दविसर्पिणी ॥२७५॥

जिसके स्वभाव और चरित्र भली भाँति ज्ञात न हो उसे कदापि आश्रय नहीं देना चाहिए क्योंकि एक खटमल के दोष से उसे आश्रय देने वाली जूं भी मारी गयी थी।

दमनक ने पिङ्गलक को खटमल और जूं की कथा सुनायी

कथा सुनाकर दमनक पिङ्गलक से बोला – “स्वामी! इसीलिए नीतिकारों ने अपरिचित व्यक्ति के साथ मैत्री करने की मनाही की है। मैं तो आपको उसे मार डालने का ही सुझाव दूँगा। यदि अपने ऐसा ना किया तो अवसर मिलते ही वह आपको मार डालेगा। अपने विश्वस्त व्यक्तियों को छोड़कर अपरिचित लोगों को गौरव देने वाला व्यक्ति ककुद्द्रुम राजा की भांति नष्ट हो जाता है।”

दमनक ने पिङ्गलक को ककुद्द्रुम राजा की कथा सुनायी

कथा सुनकर पिङ्गलक ने पूछा – “सञ्जीवक के द्वारा मेरे प्रति दुर्भाव रखने का तुम्हारे पास क्या प्रमाण है?” दमनक बोला – “उसने आज प्रातःकाल ही आपका वध करने के अपने निर्णय की जानकारी मुझे दी है। इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है? आज जब वह आपके पास आएगा उसके मुख और नेत्र लाल-लाल रहेंगे, ओठ कांप रहे होंगे और वह आपको घूर रहा होगा। इस प्रकार के लक्षणों को जानकर जो उचित समझियेगा उसे कीजियेगा।”

इस प्रकार राजा को भड़काकर दमनक चुपके से सञ्जीवक के पास जा पहुँचा। जब सञ्जीवक ने उसकी घबराहट का कारण पूछा तो दमनक बोला – “अरे भाई! सेवकों का कुशल कहाँ? जो राज सेवक होते हैं उनकी संपत्ति पराधीन, चित्त सर्वदा अशांत और अपने जीवन के सम्बन्ध में भी उनको अविश्वास बना रहता है।” सञ्जीवक ने फिर पूछा – “इतनी भूमिका बांध कर तुम कहना क्या चाहते हो?” दमनक ने उत्तर दिया – “सचिवों को स्वामी की किसी भी गुप्त योजना को प्रकाशित नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा व्यक्ति उस कार्य को तो नष्ट करता ही है, स्वयं भी नरकगामी होता है। लेकिन आपके प्रति अपने स्नेह के कारण मैं आपको स्वामी की गुप्त योजना से परिचित करा देना उचित ही समझता हूँ।”

विश्रम्भाद्यस्य यो मृत्युमवाप्नोति कथञ्चन ।
तस्य हत्या तदुत्थां सा प्राहेदं वचनं मनुः ॥२९७॥

मनु के अनुसार किसी की विश्वास में आ कर मारने वाले व्यक्ति की मृत्यु का दोषी उसे विश्वास दिलाने वाला ही होता है।

“तुम्हारे प्रति यह पिङ्गलक द्वेषभाव रखता है। आज जब मैं और वह एकान्त में थे तब उसने मुझसे कहा कि प्रातःकाल होते ही सञ्जीवक को मारकर समस्त मृग-परिवार को चिरकाल तक के लिए तृप्त करूँगा। तब उससे मैंने कहा कि मित्र-द्रोह करके जीवन व्यतीत करना ठीक नहीं होगा। मेरे इस सुझाव पर क्रुद्ध होकर पिङ्गलक ने कहा – ‘अरे मूर्ख! मैं मांसाहारी प्राणी और सञ्जीवक शाकाहारी है। हम दोनों में कैसी मित्रता? वह तो हमारा आहार है और प्राप्त आहार की उपेक्षा करना मूर्खता है। हम जानते हैं कि उसके वध का हमें कोई दोष नहीं लगेगा।’ मैं पिङ्गलक के इस विचार को जानकर ही आपके पास आया हूँ। मैंने आपको बता दिया है। अब यदि आपका अहित होता है, तो मुझ पर मित्र से विश्वासघात का दोष नहीं लगेगा। अब आप जो उचित समझें, वह करें।” – दमनक बोला।

दत्त्वापि कन्यकां वैरी निहन्तव्यो विपश्चिता ।
अन्योपायैरशक्यो यो हते दोषो न विद्यते ॥२९९॥

जब किसी अन्य उपायों द्वारा शत्रु ना मारा जाय तब अपनी कन्या देकर भी नीतिज्ञ विद्वान् अपने शत्रु का हनन करें क्योंकि उस शत्रु के मारने में कोई दोष नहीं है।

दमनक की कठोर बातें सुन कर सञ्जीवक मूर्छित हो गया। कुछ समय पश्चात् सचेत होकर बोला कि किसी ने ठीक ही कहा है –

दुर्जनगम्या नार्य्यः प्रायेणास्नेहवान्भवति राजा ।
कृपणानुसारि च धनं मेघो गिरिदुर्गवर्षी च ॥३०१॥

स्त्रियाँ प्रायः दुर्जनों से प्रीति रखती हैं, राजा प्रायः प्रेमरहित होता है, धन कृपण के पास रहता है, और मेघ पर्वत और किलों पर ही बरसते हैं।

सञ्जीवक ने आगे कहा – “मुझे पिङ्गलक से मैत्री करनी ही नहीं चाहिए थी। मित्रता और विवाह-सम्बन्ध समान धन तथा समान परिवार वाले लोगों के साथ ही शोभा देता है। अवश्य ही कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने मेरे विरुद्ध पिङ्गलक के कान भर दिये हैं, इसीलिए वह मुझ पर क्रुद्ध हो रहा है।” दमनक बोला – “यदि आप ऐसा समझते हैं तो महाराज से मिलकर उन्हें अपने वचनों से अपने अनुकूल बना सकते हैं।” सञ्जीवक ने दुःखी स्वर में कहा – “दुर्जन अपने एक उपाय के विफल हो जाने पर अन्य उपायों का सहारा ले कर अपने मनोरथ को पूरा कर लेते हैं।”

सञ्जीवक ने दमनक को कौए, गीदड़ और ऊँट की कथा सुनायी

कथा सुनाकर सञ्जीवक बोला – “दमनक! मैं समझ गया हूँ कि तुम्हारा स्वामी क्षुद्र सेवकों से घिर गया है। ऐसे स्वामी के साथ रहना उचित नहीं, नीच सेवकों से घिरा हुआ राजा प्रजा का कोई हित नहीं कर सकता। अब तुम्हारे विचार में मुझे क्या करना चाहिए?” दमनक बोला – “मेरे विचार में आपको यहाँ से भाग जाना चाहिए।” सञ्जीवक बोला – “क्रोध से भरे स्वामी को छोड़कर भाग जाने वाले सेवक का कल्याण नहीं होता। बड़ों की पहुँच भी बड़ी होती है, वे किसी को, कहीं से भी पकड़कर ला सकते हैं। अब तो मुझे युद्ध ही एकमात्र उचित उपाय लगता है।”

मृतैः सम्प्राप्यते स्वर्गो जीवद्भिः कीर्तिरुत्तमा ।
तदुभावपि शूराणां गुणावेतौ सुदुर्लभौ ॥३३३॥

युद्ध में मृत्यु होने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती है और उसमे विजय पाकर जीने से उत्तम कीर्ति मिलती है। ये दोनों गुण – स्वर्गप्राप्ति और कीर्तिप्राप्ति – वीरों के लिए दुर्लभ हैं।

सञ्जीवक के विचार सुन दमनक सोचने लगा कि यह तो युद्ध करने पर उतारू है। यदि इसके नुकीले और तीखे सींगों के प्रहार से स्वामी की छाती फट गई तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा। इसे तो किसी प्रकार रोकना होगा। दमनक बोला – “हे मित्र! तुमने ठीक कहा है, परन्तु स्वामी और सेवक की लड़ाई कैसी? और फिर शत्रु के पराक्रम को न समझकर विरोध करता है, वह उसी प्रकार पराजित होता है जैसे टिट्टिभ से समुद्र।”

दमनक ने सञ्जीवक को टिट्टिभ और समुद्र की कथा सुनायी।

यह कथा सुनकर सञ्जीवक बोला – “अब तुम बताओ कि मैं कैसे जानूँ कि पिङ्गलक दुष्टबुद्धि वाला है? इतने दिनों तक मैंने उसके स्नेही रूप को ही देखा है।” दमनक बोला – “इस विषय को जानने में बातें की क्या है? यदि तुम्हें देखते ही लाल-लाल आँखें, टेढ़ी भौहें और ओठ के किनारों को चाटने लगे तो जान लेना कि वह मामला टेढ़ा है। मुझे अब जाने दीजिए। मैं आपको यही सलाह दूँगा कि आज रात ही इस वन को छोड़ दीजिए।”

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥३८६॥

कुल की रक्षा के लिए एक व्यक्ति को छोड़ दें, ग्रामवासियों की रक्षा के लिए कुल को छोड़ दें, देशवासियों की रक्षा के लिए ग्रामवासियों को छोड़ दें और अपने आत्मसम्मान के लिए पृथ्वी को छोड़ दें।

सञ्जीवक को समझाकर दमनक करटक के पास पहुँचा तो करटक ने पूछा – “भद्र! क्या कर आये?” दमनक बोला – “मैंने तो भेद-नीति का बीज बो दिया है, आगे का काम दैव के अधीन है। मैंने उन दोनों को आपस में, असत्य वचनों से इस प्रकार मन में भेद डाल दिया है कि अब फिर उनको एक जगह बैठ कर परामर्श करते हुए तुम नहीं देखोगे।” करटक ने कहा – “यह तुमने अच्छा नहीं किया, जो परस्पर स्नेह से आर्द्रहृदय वाले थे उन दोनों को एक दूसरे के क्रोध-समुद्र में डाल दिया। एक-दूसरे के संपर्क में रहकर प्रसन्नता अनुभव करते दो प्राणियों को दुःख में धकेलने वाला पापी व्यक्ति जन्म-जन्मान्तर में दुःख भोगता है।” दमनक प्रत्युत्तर में बोला – “राजनीति की समझ न होने के कारण तुम ऐसा बोल रहे हो। सञ्जीवक को अभयदान दिला कर मैंने ही उसे महाराज से मिलवाया था, लेकिन उसने हमारे ही पद पर अधिकार कर लिया और हमें निकलकर बाहर फेंक दिया। इसीलिए मैंने उसे मार डालने की योजना बनायी है। यदि वह मरने से बच भी गया, तो यहाँ टिकने की सोच ना सकेगा। यह रहस्य तुम्हारे सिवा और कोई नहीं जानता। दूसरों को कष्ट पहुँच कर अपना उल्लू सीधा करना ही बुद्धिमत्ता है, ऐसा न करने वाले तो सिंह और शृगाल के समान अपना पेट भी नहीं भर सकते।”

दमनक ने करटक को चतुर शृगाल की कथा सुनायी।

उधर दमनक के चले जाने पर सञ्जीवक सोचने लगा कि मैंने मांस खाने वाले सिंह से मित्रता करने की मूर्खता कैसे कर ली? क्यों न पिङ्गलक के पास पहुँच जाऊँ? या किसी अन्य स्थान पर चला जाऊँ, लेकिन इसका क्या भरोसा की वहाँ किसी अन्य मांसभक्षी के हत्थे नहीं चढ़ जाऊँगा? यदि मारना ही है तो क्या सिंह और क्या अन्य? यही सब सोचकर सञ्जीवक सिंह की ओर चल दिया। जब उसने पिङ्गलक के घर में प्रवेश किया तो उसे पिङ्गलक वैसी ही मुद्रा में बैठा देखा जैसी दमनक ने बतलायी थी। इसलिए वह भी बिना प्रणाम किए चुपचाप बैठ गया। पिङ्गलक ने भी दमनक द्वारा बतलायी सञ्जीवक की मुखमुद्रा देखी, तो उसने झपट्टा मार कर अपने नखों से सञ्जीवक को घायल कर दिया। सञ्जीवक ने भी सिंह की छाती पर अपने सींगों से प्रहार कर उसे लहु-लोहान कर दिया।

उन दोनों की यह दशा देख कर करटक ने क्रोधित हो कर दमनक से कहा – “तुम निपट मूर्ख हो। नीतिकुशल मन्त्री उत्तम और कष्टसाध्य कार्यों को भी साम-दान आदि के द्वारा निपटा देते हैं, मामूली स्वार्थसिद्धि के लिये अन्याय और युद्ध को अपनाना दरिद्रता को आमंत्रित करता है। यदि तुम्हारी मंदबुद्धि के कारण स्वामी की मृत्यु हो गयी या सञ्जीवक जीवित बच गया, तो क्या यह स्थिति कष्टप्रद नहीं होगी? क्या तुम नहीं जानते कि ब्रह्माजी ने नीति के चार भेदों का निरूपण करते हुए दण्ड को पापमय तथा केवल अंतिम उपाय के रूप में ही अपनाने का निर्देश दिया है। अब भी समय है। इस स्थिति को टालने का प्रयास करो। मन्त्री की योग्यता की वास्तविक परीक्षा तो दोनों पक्षों में समझौता कराने में ही होती है।
मगर तुम यह सब कैसे कर सकते हो? जिस प्रकार मूषक अन्न से भरे पात्र को गिराना जानता है, परन्तु गिरे हुए को उठाकर रखना नहीं जानता, उसी प्रकार नीच व्यक्ति भी केवल तोड़ना ही जानता है, जोड़ना नहीं। स्वामी ने तुझ पर विश्वास कर बहुत भारी भूल की है। अगर तुम मन्त्री बन गये, तो स्वामी के पास कोई भला व्यक्ति फटकेगा भी नहीं। तुम्हारे जैसे मूर्ख को सुधारा नहीं जा सकता। मूर्ख को समझाना अपने लिए संकट मोल लेने के बराबर है।”

करटक ने दमनक को सूचीमुख की कथा सुनायी।
करटक ने दमनक को मूर्ख वानर की कथा सुनायी।
करटक ने दमनक को धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा सुनायी।

कथाएँ समाप्त कर करटक बोला – “मित्र! तुम भी पापबुद्धि हो, क्योंकि तुमने भी उपाय सोचते समय उसके कारण होने वाली हानि पर कोई ध्यान नहीं दिया। इसीलिए स्वामी के प्राणों को संकट में डालने में तुम्हें संकोच नहीं हुआ। इससे तुम्हारे चरित्र की वास्तविकता–दुष्टता–उजागर हो गयी है। जब तुम अपने महाराज के साथ ऐसा व्यवहार कर सकते हो, तो तुम्हारा साथ संकटरहित कभी नहीं हो सकता है।”

करटक ने दमनक को जीर्णधन बनिये की कथा सुनायी।

“तुमने बने-बनाये कार्य को बिगाड़ दिया। कहा भी गया है कि शुभचिंतक मूर्ख की अपेक्षा अहितकारी विद्वान् कहीं अच्छा होता है।” – ऐसा कह कर करटक ने एक और कथा सुनायी।

करटक ने दमनक को राजा और सेवक वानर की कथा सुनायी।

करटक कथा सुना ही रहा था कि पता चला कि पिङ्गलक के साथ युद्ध करते हुए सञ्जीवक मृत हो कर भूशायी है। सञ्जीवक के गुणों को याद करता हुआ पिङ्गलक अपने मित्र की हत्या पर आंसू बहाता हुआ अपने को कोस रहा है। उसके पास पहुँच कर दमनक ने शान्त स्वर में कहा – “महाराज! मुझे क्षमा करें, आप व्यर्थ दुःखी हो रहे हैं। अपने विद्रोही के वध पर पश्चाताप करना राजाओं को शोभा नहीं देता।”

सत्यानृता च परुषा प्रियवादिनी च हिंस्रादयालुरपि चार्थपरा वदान्या ।
भूरिव्यया प्रचुरवित्तसमागमा च वेश्याङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा ॥४५९॥

जिस तरह वेश्या विविध प्रकार रूप धारण करती है – वह सत्य के तुल्य प्रतीत होने पर यथार्थ में असत्य भाषिणी होती है, मधुर भाषिणी होने पर भी कठोर होती है, दयामयी होने पर भी हिंसा से पूर्ण होती है, धन की लोभी होने पर भी उदार प्रतीत होती है, बहुत धन खींचने पर भी बहुत धन व्यय करने वाली प्रतीत होती है। उसी तरह राजा की नीति भी बहुरूपिणी होती है।

अकृतोपद्रवः कश्चिन्महानपि न पूज्यते ।
पूजयन्ति नरा नागान्न तार्क्ष्यं नागघातिनम् ॥४६०॥

बिना उपद्रव किए कोई बड़ा मनुष्य भी पूजित नहीं होता। जिस प्रकार मनुष्य सर्पों की पूजा करते हैं, किन्तु सर्पघाती गरुड़ की पूजा नहीं करते।

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥४६१॥

विद्वान् व्यक्ति मृत्यु आदि शोक न करने योग्य विषयों पर शोक नहीं करते, ऐसे विषयों पर शोक करने वाले बुद्धिमान् नहीं कहलाते। मृत्यु को अनिवार्य चक्र मानकर जीवित और मृतक में अंतर न करना ही पाण्डित्य है।

इस तरह उसके समझाने पर पिङ्गलक का शोक नष्ट हो गया और वह पुनः दमनक के मन्त्रित्व से जंगल में राज्य करने लगा।


इस प्रकार पञ्चतन्त्र के मित्रभेद नामक प्रथमतन्त्र का भाषानुवाद समाप्त हुआ।